मुख्यपृष्ठ ज्ञानधार भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 क्या है, कब और क्यों लगाया जाता है?

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 क्या है, कब और क्यों लगाया जाता है?

लेखक: Adv Parul
Supreme Court Of India Court Indian Law

अक्सर आपने देखा होगा है की कुछ धाराओ के साथ 34 लिखा होता है इसका क्या मतलब होता है, जैसे धारा 302/34, 307/34, 376/34 भारतीय दण्ड संहिता (IPC) इस 34 का मतलब हम आपको इस लेख द्वारा समझाते है, यह भी भारतीय दण्ड संहिता की एक धारा है, जब किसी 2 या 2 से ज्यादा लोग एक साथ मिलकर सामान्य आशय से किसी आपराधिक कार्य को करते है तब अन्य धाराओ के साथ यह धारा जोड़ी जाती है।

 भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 क्या है? (What is Section 34 Under IPC in Hindi?)

धारा 34 के अंतर्गत कोई भी अपराध 2 या 2 से अधिक व्यक्तियों के द्वारा किया गया होता है, जिसमे उन सबका बराबर योगदान होता है, व सभी का आशय एक समान होता है तब दण्ड भी सभी व्यक्तियों को सामान्य रूप से दिया जाता है।

सामान्य आशय को करने में कई व्यक्तियों द्वारा किये गए आपराधिक कार्य:

जब कोई अपराधिक कार्य कई व्यक्तियों के समूह के द्वारा सामान्य आशय से आपराधिक कार्य करने के लिए किया जाता है, तो उस स्थिति में उस अपराधिक कार्य को करने के लिए उस समूह के प्रत्येक व्यक्ति को उस अपराधिक कार्य के सामान रूप से दायित्वाधीन माना जाता है, मानो जैसे वह आपराधिक कार्य उसी ने अकेले किया हो।

मान लीजिए यदि 4 व्यक्ति है A, B, C, D ये चारों सामान्य आशय से मिलकर किसी की हत्या कारीत करते है A, B को बंदूक लाकर देता है B गोली चलता है, C ओर D बाहर खड़े रहते है, इसमे A, B, C, D चारों हत्या करने के अपराधी माने जाएंगे।

यदि किसी व्यक्ति को कार्य का पूर्व मे ज्ञान नहीं था, वह सिर्फ मदद के लिए मोके पर पहुच जाता है, तो वह व्यक्ति धारा 34 के अधीन अपराधी नहीं माना जाएगा।

महबूब शाह बनाम सम्राट AIR 1945

महबूब शाह बनाम सम्राट AIR 1945 धारा 34 को बताने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण मामला है, इस वाद मे अल्लाहदाद नाम का एक व्यक्ति लकड़ी काट रहा था, जिसे मोहम्मद शाह ने व कासिम साह ने मना किया जब शोर-शराबे कि आवाज सुनी तब महबूब शाह व बली शाह मदद के लिए भागे बली शाह ने अल्लाहदाद पर गोली चला दी और वहा से भाग गया अल्लाहदाद की मृत्यु हो गई, अल्लाहदाद की हत्या के लिए महबूब शाह पर अभियोजन चलाया गया इस मामले मे कोर्ट ने कहा की महबूब शाह का आशय सिर्फ मदद का था इसलिए महबूब शाह को धार 34 के अंतर्गत अपराधी नहीं माना जा सकता।

सयुंक्त दायित्व का सिद्धांत:

भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत कुछ ऐसे भी उपबंध है जो ऐसे व्यक्ति के दायित्व को निर्धारित करते है जो दूसरे अन्य लोगों के साथ मिलकर किसी भी प्रकार के कोई अपराध को अंजाम देता है। इस प्रकार के सभी उपबंधों में सयुक्त दायित्व को सम्मिलित किया जाता है क्यूंकि इसमें या तो आशय या फिर उद्देश्य सामान्य होता है। भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत आपराधिक दायित्व का विनिश्चय इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति उस अपराधिक कृत्य से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है।

सामान्य रूप में एक व्यक्ति किसी अपराध में निम्नलिखित रूप से सम्बंधित हो सकता है:

  1. जब वह अपराध को स्वयं अंजाम देता है, या
  2. जब वह किसी अपराधिक कार्य में भाग लेता है, या
  3. जब वह अपराध स्वयं न करके किसी अन्य व्यक्ति से करवाता है, या
  4. जब वह अपराध घटित होने के पश्चात अभियुक्त को न्याय से छुपाने की कोशिश करता है। (यह जानते हुए भी उस व्यक्ति ने अपराधिक कार्य को अंजाम दिया है)

अवयव-आइये जानते है इसके अवयव को:

धारा 34 के अंतर्गत संयुक्त दायित्व के सिद्धांत को आकर्षित करने के लिए निम्नलिखित अव्यव आवश्यक होते है:

  1. एक अपराधिक कार्य का होना।
  2. ऐसा अपराधिक कार्य जो एक से अधिक व्यक्तियों के द्वारा किया गया हो।
  3. अपराधिक कार्य को करने के लिए सभी अपराधियों द्वारा सामान्य आशय को करने हेतु किया गया हो।
  4. जो भी कार्य किया जाना है आपराधिक व्यक्तियों के बीच सामान्य आशय पूर्व निर्धारित योजना के तहत होना चाहिए।
  5. अपराध में सभी कथित अभियुक्तों का उस अपराध में किसी न किसी प्रकार से जुड़ा होना आवश्यक होता है।
  6. अपराध घटित होते समय सभी व्यक्तियों की शारीरिक उपस्थिति का होना।

अपराधिक कृत्य- जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों के समूह के द्वारा किसी अपराधिक कार्य को अंजाम दिया जाता है। तब वहाँ धारा 34 में प्रयुक्त “अपराधिक कृत्य” शब्द किसी एक व्यक्ति के लिए प्रयोग में नहीं आता बल्कि उस अपराध से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोग में लाया जाता है।

सामान्य आशय – इसे बहुत से अर्थ प्रदान किये गए है-

  1. घटना को करने से पूर्व सभी अपराधियों के बीच पहले पूर्व निर्धारित योजना अन्तर्निहित होनी चाहिए, विचारों का पूर्व मिलान, प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध में शामिल है उन सभी के मध्य पूर्व विचार-विमर्श का होना।
  2. सामान्य आशय का अर्थ है, परिणाम की कल्पना करे बिना एक आपराधिक कृत्य करीत करने इच्छा।
  3. सामान्य आशय का अर्थ है, अपराध को निर्मित करने हेतु आवश्यक दुराशय।
  4. इसका तात्पर्य कोई अपराधिक कृत्य करीत करने के आशय से भी है। (लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि अपराध वही हो जो घटित हुआ है)

शारीरिक उपस्तिथि तथा सक्रिय सहभागीदारी कब आवश्यक है-

यह प्रेक्षित किया गया है की धारा 34 के प्रवर्तन के लिए आवश्यक है, कि अभियुक्त घटनास्थल में सशरीर मौजूद रहा हो तथा अपराध कारित करने में उसने हिस्सा लिया हो यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि वह उसी स्थान पर उपस्थित हो जहाँ अपराध घटित हुआ हो परंतु यह आवश्यक है की वह इतना नजदीक हो जहां से वह खड़ा हो कर अपराध को देख भी सके और निगरानी भी कर सके ताकि आने वाले खतरे की सूचना अपने साथियों को दे सके। वह शारीरिक रूप से उपस्थित रहा हो तथा वास्तविक अपराध घटित होते समय उसने उसमे हिस्सा लिया हो।

सिद्धि का दायित्व – धारा 34 को आकर्षित करने के लिए इस तथ्य को निःसन्देह सिद्ध करना चाहिए कि अपराधिक कृत्य सभी अभियुक्तों के सामान्य आशय को अग्रसर करने के उद्द्शेय से किया गया हो, दूसरे शब्दो में अभियोजन द्वारा सिद्ध किया जाना चाहिए की सभी सहयोगियों ने सामान्य आशय से हिस्सा लिया तथा अपराध उसी सामान्य आशय के अधीन एक या अनेक सहभागियों द्वारा किया गया था। यदि, किसी अपराध को कारित करने के लिए अभियुक्त एकमत थे तो यह कहा जायेगा की उनका सामान्य आशय उस अपराध को कारित करने का था। सामान्य आशय के लिए पूर्व सुनियोजित होनी चाहिए चाहे वह अचानक ही क्यों न तैयार हुई हो।

एक व्यक्ति को सजा तथा अन्य को विमुक्ति-

धारा 34 के अंतर्गत किसी अपराध में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से दण्डित किया जाता है, परन्तु यदि केवल एक व्यक्ति को सजा होती और अन्य सभी को बिमुक्त कर दिया जाता है, सजा को न्यायोचित नहीं माना जायेगा इसीलिए धारा 34 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को सामान रूप से दण्डित करने का प्रावधान बनाया गया है।

धारा 34 के अंतर्गत प्रतिनिहित दायित्व-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के अधीन प्रतिनिहित दायित्व तभी माना जायेगा जब दो शर्ते पूरी हो अर्थात मानसिक तत्व या अन्य अभियुक्तों के साथ मिलकर आपराधिक कृत्य को कारित करने का आशय तथा दूसरा अपराध कारित करने में किसी न किसी रूप में वास्तविक भागीदारी।

  • किसी अभियुक्त को तभी दोषसिद्ध किया जा सकता है जब ऐसे आशय में सभी अभियुक्त भागीदार हों।
  • इस प्रकार धारा 34 का महत्वपूर्ण तत्व है आशय और कृत्य में भागीदारी।
  • धारा 34 किसी विशिष्ट अपराध का सृजन नहीं करती है वरन प्रतिनिहित दायित्व का सिद्धांत निर्धारित करती है धारा 34 यह अभिधारित करती है कि कार्य सामान्य आशय के अग्रसरण में किया गया होना चाहिए।

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